परिवार:- परिवार राष्ट्र एवं समाज कि मूलभूत इकाई है। यह समाज की सबसे छोटी एवं नागरिकता की सर्वप्रथम पाठशाला है।
परिवार वह संरचना है जहां स्नेह, संबंध, संगठन, सहयोग, सुख-दुख कि साझेदारी सौहार्दपूर्ण वातावरण में निष्ठापूर्वक अपने पारिवारिक दायित्वों का निर्वहन करते हुए एवं सबमें सबके होने की स्वीकृति जैसे जीवन मूल्यों को जिया जाता है। एक स्वस्थ संस्कारों से सुसज्जीत परिवार ही अंततः शक्तिशाली राष्ट्र निर्माण में सहायक होता है।
एक शीशु कि माता ही उसकी सर्वप्रथम शिक्षिका होती है। मां के उच्च संस्कार ही बच्चे के संस्कार निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। अतः यह अत्यावश्यक है कि सर्वप्रथम माता-पिता संस्कारवान बनें, तभी बच्चे चरित्रवान बनकर परिवार कि प्रतिष्ठा को पल्लवित कर सकेंगे। परिवार से ही समाज बनता है एवं समाज से देश; अर्थात यदि समाज की सबसे छोटी इकाई परिवार की परवरिश अच्छे ढंग से हो तो निश्चित रूप से एक सुशिक्षित एवं संस्कारी समाज की ओर अग्रसर होते हुए एक स्वस्थ एवं सबल देश का निर्माण कर सकते हैं। व्यक्ति की पहचान उसके संस्कारों से होती है संस्कार हमारी जीवनी शक्ति है यह एक निरंतर जलने वाली दीपशिखा है जो जीवन के अंधेरे में भी प्रकाश की किरणें आच्छादित करते हैं एवं उच्च संस्कार ही मानव को महामानव बनाते हैं।
ई एम व्हाइट के अनुसार 'परिवार के गुण नागरिकता के गुणों में वैसे ही बदल जाते हैं जैसे कली खिलकर फूल बन जाती है।
विश्व के कई हिस्सों में परिवार को तरजीह देने की संस्कृति है परंतु कुछ ऐसे भी भू भाग हैं जहां माता-पिता और बच्चों में अपनत्व की कमी पाई जाती है। निहित स्वार्थ उनकी संस्कृति का हिस्सा माना जाता है। बुजुर्ग माता-पिता को साथ रखना निजी जीवन में हस्तक्षेप माना जाता है।
संयुक्त परिवार ऐतिहासिक रूप से भारत में पारंपरिक आदर्श परिवार माने जाते हैं। यह पारिवारिक एकजुटता, पारिवारिक निष्ठा और पारिवारिक एकता पर जोर देता है । जनगणना 2011 के अनुसार देश में संयुक्त परिवार या कुटुंब की केवल 20% हिस्सेदारी है जबकि एकल परिवारों की संख्या 70% है।
भारत का दर्शन "वसुधैव कुटुंबकम् " का पालन करता है। जहां भारतीय समाज का दृष्टिकोण 'सामूहिकतावादी' है इसके विपरीत पश्चिमी समाज 'व्यक्तिवाद' को बढ़ावा देता है। यह परस्पर निर्भरता सामाजिक एकीकरण और सहयोग को बढ़ावा देती है परिवार इस सामाजिक संरचना का केंद्र बिंदु होता है।भारत में भी पिछले कुछ वर्षों से पारिवारिक संरचना में महत्वपूर्ण बदलाव हुए हैं। यह परिवर्तन भूमंडलीकरण, आधुनिकता ,परंपराओं की सांस्कृतिक बदलाव एवं सामाजिक-आर्थिक कारकों के बीच जटिल अंतर्संबंधों को दर्शाते हैं। भारतीय समाज शहरीकरण,वैश्वीकरण,प्रौद्योगिकीय प्रगति एवं लैंगिक भूमिकाओं में आने वाले बदलावों से भी प्रभावित हुए हैं। एवं प्रमुख कारकों में नौकरी हेतु प्रवास, व्यक्तिगत स्वतंत्रता की तीव्र इच्छा एवं नारी सशक्तिकरण भी शामिल है।
संयुक्त परिवारों में बिखराव के प्रमुख कारक निम्नलिखित हैं-
१. सोशल मडिया- इसने लोगों को आभासी दुनिया में इतना व्यस्त कर दिया है जिसके फल स्वरुप पारिवारिक सदस्यों के बीच प्रत्यक्ष संवाद की कमी हो गई है।
६. विचारधारा में कमी- बदले समाजिक परिवेश एवं तकनीकी क्रांति के कारण युवाओं एवं बुजुर्गों के विचारों में भिन्नता के कारण अलगाव बढ़ता जा रहा है।
हम चाहे जितना भी आधुनिक विचारधारा मैं पले बढ़ें हों परंतु अंततः अपने संबंधों को विवाह संस्था से जोड़कर परिवार में परिवर्तित करने में ही आत्म संतुष्टि का अनुभव करते हैं। सुखद पारिवारिक जीवन के लिए संस्कार एवं सहिष्णुता भी आवश्यक है। प्रायः सभी रिश्तों में सहिष्णुता की शक्ति में ह्रास होता हुआ देखा गया है। पारिवारिक विघटन के अनेक कारण है लेकिन इसमें सर्व प्रमुख एवं महत्वपूर्ण कारक आर्थिक ही है। पुराने जमाने में सामाजिक मूल्य अत्यधिक महत्वपूर्ण था अर्थ गौड़ था परंतु आधुनिक समाज में जो आर्थिक रूप से मजबूत नहीं है उसका इस समाज में कोई वजूद नहीं है। रोजगार के अभाव में लड़के एवं लड़कियों की शादी समय पर नहीं हो पा रही है। शादियां महंगी होती जा रही है। बढ़ते महंगाई के जमाने में एक ही शादी करने में लोगों की कमर टूट जा रही है इसलिए आर्थिक मूल्य के आगे नैतिक मूल्य को कमतर आंका जा रहा है।
संयुक्त परिवारों में बिखराव के प्रमुख कारकों में काॅरपोरेट जगत का भी बहुत बड़ा योगदान है। कॉरपोरेट कंपनियों की वजह से लोग अलग-अलग महानगरों में रहते हैं जाॅब गारंटी ना होने की वजह से पति-पत्नी दोनों काम करते हैं। आज की भोगवादी संस्कृति ने उपभोक्तावाद को जिस तरह से बढ़ावा दिया है उसकी चकाचौंध से ही आदमी को पहचाना जा रहा है। यह निकट भविष्य में बड़ा ही भयावह होने वाला है यही स्थितियां पारिवारिक बिखराव का प्रमुख कारण बन रही है। नौकरी शुदा बहूओं ने तो परिवारका का आमूल-चूल परिवर्तन ही कर दिया है। अब नई बहूएं परिवार में समायोजन के स्थान पर अपनी समानांतर सरकार चलाती हैं। पति सब कुछ जानते हुए भी मौन के अतिरिक्त कोई दूसरा विकल्प नहीं होता है इसलिए पारिवारिक मूल्यों को पहचान कर उन्हें पुनर्स्थापित करना आज के समाज की आवश्यकता है। संयुक्त परिवारों का प्रचलन कम हो रहा है। बड़े परिवार विघटित होकर संयुक्त परिवार में रहने के बजाय अलग आशियाना बनाकर उसे घर परिवार कहते हैं। यह स्पष्ट है कि मुख्य कारण परिवार के सदस्यों के बीच अंतर्कलह एवं मनमुटाव भी है। परिवार को एक रखने हेतु सभी को हक की बात छोड़कर कर्तव्य का निर्वहन करने की प्रवृत्ति लानी होगी।
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